श्रीदुर्गासप्तशती – प्रथमोऽध्यायः (१)

ॐखड्गं चक्र-गदेषु-चाप-परिधाळूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्ख संदधतीं करैस्विनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्। नीलाश्म-द्युतिमास्य-पाददशकां सेवे महाकालिकाम् यामस्तौत्स्वपिते हरी कमलजो हन्तुं मधु कैटभम् ॥

ध्यान- भगवान् विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने पर महा बलवान्

दैत्य मधु और कैटभ के संहार-निमित्त पद्मयोनि-ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली देवी का मैं स्मरण करता हूँ। वे अपनी दस भुजाओं में क्रमशः खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिष (फेंककर चलाया जाने वाला एक प्राचीन अस्त्र), शूल, भुशुण्डि (बन्दूक), मस्तक और शंख धारण करती हैं। यह तीन नेत्रों से युक्त हैं और उनके सम्पूर्ण अंगों में दिव्य आभूषण (कभी जीर्ण न होने वाले) पड़े हैं। नीलमणि के सदृश उनके शरीर की आभा है एवं वे दशमुखी तथा दस पादों वाली हैं।

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